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बलिया: वीरों की धरती, अध्यात्म और पुराणों की समृद्ध धरोहर माँ भवानी के दिव्य स्वरूप की कथा

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दुर्गा सप्तशती में वर्णित कर्णमूल की रक्षा करने वाली देवी,राजा सूरथ की तपस्थली और पाँच मंदिरों की प्राचीन स्थापना,भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाली स्वयं सिद्ध शक्तिपीठ

न्यूज़ 11 बिहार | बलिया

उत्तर प्रदेश का बलिया जिला अपने वीर सपूतों के कारण तो प्रसिद्ध है ही, साथ ही यह धरती अध्यात्म, तप और पुराणों की किंवदंतियों से भी भरी पड़ी है। भृगु ऋषि की तपस्थली के रूप में विख्यात यह भूमि बाबा भृगुनाथ और दादर ऋषि की स्मृतियों से आज भी ओतप्रोत है। दादर ऋषि की याद में लगने वाला प्रसिद्ध **ददरी मेला** आज भी बलिया की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का प्रतीक है। इसी पावन धरती पर बलिया–बाँसडीह मार्ग स्थित **शंकरपुर मझौली** में माँ भवानी का एक अद्भुत स्वरूप विराजमान है, जिसे भक्त *माँ शांकरी(कलिका भवानी ) के नाम से जानते हैं। मान्यता है कि माँ भवानी अपने इस रूप में यहाँ साक्षात प्रकट हुईं और भक्तों का कल्याण करती हैं। मंदिर के पुजारी ओम प्रकाश पांडेय बताते हैं कि इस स्वरूप का उल्लेख दुर्गा सप्तशती के कवच मंत्र के 23वें श्लोक में मिलता है।

“शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी। कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी॥”

इस मंत्र के अनुसार दोनों नेत्रों के मध्य भाग की रक्षा माँ शंखिनी करती हैं, कानों की रक्षा द्वारवासिनी देवी करती हैं, कपोलों की रक्षा कालिका और कर्णमूल की रक्षा स्वयं माँ शांकरी करती हैं। इसीलिए माना जाता है कि माँ शांकरी की पूजा से कान संबंधी रोगों और जॉन्डिस जैसी बीमारियों से मुक्ति मिलती है।

लक्ष्मी–नारायण मंदिर भी है विशेष आकर्षण

पंडित विश्वनाथ पांडेय (दाढ़ी बाबा)

माँ के मंदिर के ठीक सामने श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर स्थित है, जिसका निर्माण वर्ष 1996 में स्वर्गीय पंडित विश्वनाथ पांडेय (दाढ़ी बाबा) द्वारा कराया गया था। माँ शांकरी के दर्शन के बाद भक्त यहाँ अवश्य पहुँचते हैं और लक्ष्मी–नारायण के चरणों में अपनी मनोकामनाएँ व्यक्त करते हैं।

राजा सूरथ की तपस्थली: पाँच दिव्य मंदिरों की स्थापना

दुर्गा सप्तशती के पहले अध्याय में वर्णित राजा सूरथ की कथा बलिया से गहराई से जुड़ी है। पुराणों में वर्णित है कि उनका विशाल साम्राज्य शत्रुओं द्वारा हरण कर लिया गया था। दुखी होकर वन–वन भटकते राजा सूरथ बलिया के सुरहा ताल के किनारे पहुँचे, जहाँ उन्हें तपस्वी मेघा ऋषि का सान्निध्य मिला। उनकी प्रेरणा से राजा सूरथ ने यहाँ माँ अपराजिता की कठोर तपस्या की। माता उनकी समर्पित साधना से प्रसन्न हुईं और उन्हें पुनः राज्य प्राप्त हुआ। माता की कृपा से ही राजा सूरथ ने एक विशाल यज्ञ कराया और सुरहा ताल के चारों दिशाओं में पाँच मंदिरों की स्थापना की। इनमें दो मंदिर माँ भवानी के और तीन मंदिर भगवान शिव के थे।

माँ भवानी के दो स्वरूप—

मंदिर के पुजारी के अनुसार माँ भवानी के दो स्वरूप है ब्रह्माइन देवी एवं माँ शांकरी देवी वही तीन शिव मन्दिर भी है जिसे बाबा बालखंडी नाथ (असेगा),शोकहरण नाथ, एवं अवनिनाथ के नाम से जाना जाता है जो बलिया जिला मुख्यालय से लगभग 9 किलोमीटर दूरी पर स्थित ये मंदिर आज भी श्रद्धालुओं की अटूट भक्ति के केंद्र हैं।

पुराणों में बलिया का उल्लेख

बलिया की यह पवित्र कथा केवल दुर्गा सप्तशती तक सीमित नहीं है। इसका उल्लेख मार्कण्डेय पुराण, वाराह पुराण और देवी भागवत जैसे प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है। इन ग्रंथों में राजा सूरथ की तपस्या, माता की कृपा और मंदिरों की दिव्य स्थापना का विस्तृत वर्णन है, जो इस क्षेत्र की प्राचीनता और आध्यात्मिक महत्ता को प्रमाणित करता है।

माँ शांकरी: भक्तों की हर मनोकामना करती हैं पूर्ण

माँ शांकरी मंदिर के पुजारी पंडित सनातन पांडेय बताते हैं कि यह मंदिर स्वयं सिद्ध माना गया है और यहाँ माता की पूजा से कान के रोगों, जॉन्डिस और अन्य शारीरिक मानसिक कष्टों से राहत मिलती है। भक्तों की हर मनोकामना माता अवश्य सुनती हैं और उन्हें कल्याण का वरदान देती हैं। कर्णमूल की रक्षा से जुड़े सप्तशती के मंत्र के कारण यहाँ दूर–दूर से श्रद्धालु पहुँचते हैं।

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