तत्कालीन डीएम के मौखिक आदेश पर हुए कार्यों का भुगतान अटका, संवेदक परेशान, डीईओ ने गठित की पांच सदस्यीय तकनीकी कमिटी, मूल्यांकन पर निर्भर भुगतान
न्यूज़ 11 बिहार | बक्सर
बक्सर जिले में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की प्रगति यात्रा के दौरान विभिन्न विद्यालयों में कराए गए मरम्मत और सौंदर्यीकरण कार्यों का भुगतान अब अधिकारियों के आपसी पेंच में उलझकर फंस गया है। यह मामला अब विभागीय स्तर पर गंभीर रूप लेता जा रहा है, और संवेदकों को चार महीने बीत जाने के बावजूद उनके कार्य के एवज में भुगतान नहीं मिल सका है, जिससे वे नाराज और हताश हैं।
मुख्यमंत्री की यात्रा 15 फरवरी को हुई थी, इससे पहले ही जिला प्रशासन के मौखिक आदेश पर विभिन्न विद्यालयों में रंगाई-पुताई, भवन मरम्मत, शौचालय की सफाई, पानी की व्यवस्था, फर्नीचर मरम्मत समेत अन्य कार्यों को त्वरित रूप से कराए गए थे। इन कार्यों का मुख्य उद्देश्य मुख्यमंत्री के निरीक्षण से पहले विद्यालयों की सूरत सुधारना था।
-चार सदस्यी टीम के द्वारा विधालय में कराए गए कार्यो का होगा जांच
हालांकि, अब तक भुगतान की प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई है। इस संदर्भ में जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) अमरेंद्र पांडेय ने कार्य कराने के तीन महीने बाद एक पांच सदस्यीय तकनीकी कमिटी का गठन किया है, जो कार्यों के मूल्यांकन के बाद ही भुगतान की सिफारिश करेगी। कमिटी का नेतृत्व जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (समग्र शिक्षा) शारिक अशरफ कर रहे हैं। इसके साथ ही कमिटी में चार अभियंताओं को भी शामिल किया गया है, जो भौतिक निरीक्षण, प्राक्कलन और कार्यों की वस्तुस्थिति का आकलन करेंगे।
-तत्कालीन जिलाधिकारी के मौखिक आदेश पर हुआ है कार्य
डीईओ ने पत्र संख्या 1009 दिनांक 29/05/25 में यह स्पष्ट किया है कि सभी मरम्मत कार्य तत्कालीन जिलाधिकारी अंशुल अग्रवाल के मौखिक आदेश पर मुख्यमंत्री की यात्रा के मद्देनजर कराए गए थे। जिलाधिकारी ने 17 मई को मौखिक रूप से यह निर्देश दिया था कि कार्यों के मूल्यांकन के लिए एक कमिटी बनाई जाए, ताकि वास्तविकता का आकलन कर भुगतान किया जा सके। लेकिन, कमिटी ने कार्य प्रारंभ करने से पहले ही जिला शिक्षा पदाधिकारी से स्पष्टीकरण मांग लिया है।
कमिटी के सदस्यों ने पत्रांक 36 दिनांक 12/06/26 को डीईओ को पत्र भेजकर बताया है कि उनके द्वारा जारी पत्र में यह स्पष्ट नहीं है कि किन-किन विद्यालयों में कार्य कराए गए हैं और किन-किन कार्यों की जांच की जानी है। इस स्थिति में बिना सूची के मूल्यांकन संभव नहीं हो पा रहा है। कमिटी ने शीघ्र सूची उपलब्ध कराने की मांग की है ताकि निरीक्षण कार्य शुरू किया जा सके और संवेदकों को समय पर भुगतान हो सके।
-भुगतान में विलम्ब ससंवेदक परेशान
वहीं, संवेदकों का कहना है कि उन्होंने अपनी पूंजी और संसाधनों से कार्य पूरे किए हैं, लेकिन अब वे भुगतान के लिए विभागों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। कई संवेदकों ने यह भी बताया कि उन्हें उम्मीद थी कि मुख्यमंत्री के दौरे से पहले कराए गए कार्यों का भुगतान तुरंत होगा, लेकिन अब वे लगातार अधिकारियों से भुगतान की आश्वासन पा रहे हैं।
जानकार सूत्रों के अनुसार, कार्यों की स्वीकृति मौखिक रूप से जिलाधिकारी द्वारा दी गई थी, लेकिन लेखा परीक्षण और वित्तीय पारदर्शिता के लिए अब लिखित साक्ष्य की आवश्यकता महसूस की जा रही है। विभागीय प्रक्रिया के अनुसार, बिना उचित प्राक्कलन, स्वीकृति और कार्यादेश के किए गए कार्यों का भुगतान तभी संभव है जब उनकी सघन जांच हो और यह साबित हो कि कार्य वास्तव में किया गया है और उसकी गुणवत्ता संतोषजनक है।
-जिला प्रशासन व शिक्षा विभाग के बीच खीचा तानी
इस मामले में शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन के बीच तालमेल की कमी भी उजागर हो रही है। जहां शिक्षा विभाग कमिटी गठन कर अपनी जिम्मेदारी निभाने का प्रयास कर रहा है, वहीं कार्यों की मूल स्वीकृति और सूची के अभाव में पूरा मूल्यांकन कार्य विलंबित हो गया है। अब सभी की नजरें कमिटी की रिपोर्ट और डीईओ द्वारा सूची उपलब्ध कराने पर टिकी हुई हैं। यदि शीघ्र यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती है, तो संवेदकों के धैर्य का बांध टूट सकता है और वे आंदोलन की राह पकड़ सकते हैं।
यह स्थिति न केवल प्रशासनिक अक्षमता को उजागर करती है, बल्कि उन संवेदकों की पीड़ा को भी रेखांकित करती है, जो सरकारी भरोसे पर कार्य करते हैं और अब भुगत रहे हैं। विभागीय प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और समयबद्धता लाना अब अनिवार्य हो गया है, ताकि भविष्य में इस तरह की जटिल स्थितियों से बचा जा सके। अब यह देखना बाकी है कि जिला शिक्षा विभाग जल्द ही कमिटी को कार्यों की सूची उपलब्ध कराता है या नहीं।
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