Advertisement

NMMS की तस्वीरें चीख-चीख कर बोल रहीं हैं, राजपुर–नावानगर में मनरेगा बना कागजी रोजगार योजना

Share

-राजपुर प्रखंड में मास्टर रोल बना फर्जी हाजिरी का दस्तावेज,धान की खड़ी फसल के बीच कागजों में हो गया करहा सफाई कार्य,एक ही फोटो से चार योजनाओं में मजदूरों की उपस्थिति दर्ज

पुरुष कैमरे में, महिलाएं मास्टर रोल में दर्ज,नावानगर में योजनाओं की भरमार, निगरानी का अभाव

50 रुपये में बिक रही मजदूरों की फोटो, काम सिर्फ कागजों पर,मनरेगा रोजगार नहीं, सिस्टम के लिए कमाई की योजना बनती जा रही

न्यूज 11 बिहार | बक्सर

बक्सर जिले के राजपुर प्रखंड में संचालित मनरेगा योजनाओं का हाल ऐसा है कि यदि कोई ईमानदारी से एनएमएमएस पोर्टल पर अपलोड की गई तस्वीरों को देख ले, तो उसे जांच की जरूरत ही नहीं पड़े। तस्वीरें खुद बयां कर रही हैं कि मनरेगा अब जमीन पर नहीं, बल्कि कैमरे और मास्टर रोल के भरोसे चल रही है। ताजा मामला राजपुर और नावानगर प्रखंड से जुड़ा है, जहां मनरेगा के नाम पर सरकारी राशि की खुली लूट हो रही है। पहला मामला राजपुर प्रखंड की दुलफा पंचायत का है। पंचायत समिति क्षेत्र अंतर्गत जगमनपुर में विकास दुबे के खेत होते हुए सड़क तक करहा सफाई कार्य की योजना (मास्टर रोल संख्या 9892) कागजों में पूरे जोर-शोर से चल रही है। लेकिन 15 दिसंबर को एनएमएमएस पर अपलोड की गई तस्वीर कुछ और ही कहानी कह रही है। फोटो के पीछे खेत में हरी-भरी लहलहाती धान की फसल साफ नजर आ रही है, जबकि पूरे जिले में धान की कटाई अंतिम चरण में है।

राजपुर पंचायत के दुलफा का तस्वीर

सवाल उठता है कि जब फसल खड़ी है, तो सफाई का काम हुआ कब? यहीं कहानी खत्म नहीं होती। दुलफा पंचायत में तो फोटो ही मजदूर बन गए हैं। आरोप है कि फोटो से फोटो खींचकर हाजिरी बनाई जा रही है। इससे भी बड़ा खेल तब सामने आया जब दो अलग-अलग योजनाओं में एक ही मजदूरों के समूह की तस्वीर अपलोड कर दी गई। मास्टर रोल संख्या 9896 में अपलोड फोटो में सिर्फ पुरुष मजदूर दिखते हैं, जबकि मास्टर रोल में महिला मजदूरों की भारी संख्या दर्ज है। यानी महिलाएं कागज पर काम कर रही हैं और पुरुष कैमरे के सामने। हालात इतने गंभीर हैं कि दुलफा पंचायत में वर्तमान में संचालित चारों योजनाओं में एक ही फोटो से मजदूरों की उपस्थिति दर्ज कर दी गई है। यही स्थिति राजपुर प्रखंड के अधिकांश पंचायतों की बताई जा रही है, जहां मनरेगा अब रोजगार गारंटी नहीं, बल्कि “फोटो गारंटी योजना” बन चुकी है।

उधर नावानगर प्रखंड में भी हालात कोई बेहतर नहीं हैं। यहां वर्तमान समय में 13 पंचायतों में 60 योजनाएं संचालित हैं, जिनमें कागजों के अनुसार 1868 मजदूर कार्यरत हैं। मगर जमीनी हकीकत यह है कि यहां भी भ्रष्टाचार बेलगाम है। न रोकने वाला है, न टोकने वाला। नावानगर के भदार पंचायत में तो स्थिति और भी चौंकाने वाली है। यहां एक ही मजदूर को कई योजनाओं में काम करते हुए दिखा दिया गया है। एनएमएमएस पर हाजिरी बनाने के लिए मजदूरों को प्रतिदिन 50 रुपये देकर फोटो खिंचवाया जाता है। यानी मजदूरी काम की नहीं, फोटो की मिल रही है। पंचायत में मनरेगा का काम सिर्फ कागजों में पूरा हो चुका है, जबकि धरातल पर सन्नाटा पसरा है। कुल मिलाकर, राजपुर और नावानगर में मनरेगा की तस्वीरें यह सवाल छोड़ जाती हैं—क्या योजना गरीबों के लिए है या फिर सिस्टम के कुछ लोगों की जेब भरने के लिए? अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इन तस्वीरों को भी नजरअंदाज करते हैं या कभी कैमरे से आगे जमीन तक पहुंचने की हिम्मत दिखाते हैं।

(ए के ओझा )

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *