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आपातकाल विरोधी आंदोलन के नायक रहे बालाजी पाठक को भुला रहा है संघ व भाजपा

आपातकाल विरोधी आंदोलन के नायक रहे बालाजी पाठक को भुला रहा है
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डुमरांव के नेनुआ गांव के रहने वाले थे प्रसिद्ध अधिवक्ता श्री पाठक,19 माह मीसा के अंतर्गत काटे है जेल

न्यूज़ 11 बिहारदेश में आपातकाल के विरोध में जब पूरा लोकतंत्र कुचला जा रहा था, उस कठिन समय में शाहाबाद क्षेत्र से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता, समाजसेवी एवं प्रसिद्ध अधिवक्ता बालाजी पाठक ने न केवल नेतृत्व किया, बल्कि अपने परिवार सहित भारी कीमत भी चुकाई। डुमरांव प्रखंड के नेनुआ गांव निवासी बालाजी पाठक ने अपनी मजबूत वकालत छोड़ कर आपातकाल विरोधी आंदोलन को धार दी।

उनके छोटे भाई परशुराम पाठक और भतीजे महेन्द्र नाथ पाठक ने भी इस आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई। आंदोलन के दौरान प्रशासन द्वारा उनके घर की कुर्की-जब्ती की गई और अंततः तीनों को मीसा के तहत 19 माह की लंबी जेल यात्रा करनी पड़ी। इस दौरान उनका परिवार घोर आर्थिक संकट से गुजरा, लेकिन सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं किया। आपातकाल के बाद रिहाई हुई, लेकिन इसके बाद भी बालाजी पाठक संघ और भाजपा संगठन के प्रति पूरी निष्ठा से समर्पित रहे।

उनका आवास वर्षों तक कार्यकर्ताओं, पदाधिकारियों और बड़े नेताओं का केंद्र बना रहा, लेकिन कभी भी उन्होंने संगठन या पार्टी से न तो कोई पद मांगा, न ही पुत्र विंध्याचल पाठक के लिए कोई सिफारिश की। ऐसे निःस्वार्थ और कर्मठ कार्यकर्ता को आज संघ और भाजपा द्वारा भुला दिया जाना अत्यंत दुखद है। हाल ही में बक्सर में आयोजित एक कार्यक्रम में जब आपातकाल के मुद्दे पर वक्तव्य दिए गए, तब भी किसी ने बालाजी पाठक जैसे संघर्षशील और समर्पित योद्धा का स्मरण नहीं किया।

यह संघ और पार्टी के लिए आत्ममंथन का विषय है कि जिन लोगों ने अपना सबकुछ संगठन के लिए समर्पित किया, उन्हें आज क्यों भुलाया जा रहा है। आज जब बालाजी पाठक 90 वर्ष की अवस्था में हैं, भले ही शारीरिक रूप से सक्रिय न हों, लेकिन वैचारिक रूप से आज भी संगठन के प्रति उनकी आस्था अडिग है। ऐसे लोगों की सुध लेकर ही युवा पीढ़ी को प्रेरित किया जा सकता है और संगठन को मजबूती दी जा सकती है।

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